लाल किले से राष्ट्र के नाम संबोधन करनेवाले पहले संत थे तरुण सागर

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भोपाल| शनिवार को देवलोक गमन करनेवाले जैनमुनि तरुण सागर अपने तीखे प्रवचनों के कारण जाने जाते थे। अन्य किसी जैन संत के मुकाबले उन्हें ज्यादा मुखर माना जाता था। तरुण सागर की पहचान क्रांतिकारी संत के रूप में थी। वे कभी तीखे बयानों, तो कभी कड़वे प्रवचनों के कारण हमेशा सुर्खियों में रहे। वे ऐसे जैन संत थे, जिन्होंने 33 साल की उम्र में लालकिले से राष्ट्र को संबोधित भी किया था। इसके चलते उन्हें राष्ट्रसंत की पदवी से नवाजा गया था। वह भारतीय सेना को भी संबोधित कर चुके थे।

मध्यप्रदेश में जन्म, छत्तीसगढ़ में दीक्षा

बचपन से ही अध्यात्म की ओर झुकाव रखने वाले मुनि तरुण सागर का जन्म मध्यप्रदेश में बुंदेलखंड अंचल के दमोह जिले के गुहंची गांव में 26 जून 1967 को हुआ था। माता शांति बाई और पिता प्रताप चंद्र जैन के पुत्र पवन कुमार ने युवा अवस्था में कदम रखते ही 8 मार्च 1981 को घर त्याग दिया था। उन्होंने राजस्थान के बागीडोरा के आचार्य पुष्पदंत सागर से छत्तीसगढ़ में मुनि दीक्षा ली थी। मुनि तरुण सागर को मध्यप्रदेश सरकार ने 6 फरवरी 2002 को राजकीय अतिथि का दर्जा दिया था। उन्होंने मध्यप्रदेश विधानसभा में भी प्रवचन दिया था।

जन्म सुधारो, मौत अपने आप सुधर जायेगी

तरुण सागर हर मुद्दे पर अपनी राय बेबाकी से रखते थे। चाहे हरियाणा विधानसभा में प्रवचन देना हो या पाकिस्तान को सबक सिखाने की बात। वे हर मुद्दे पर अपना पक्ष बेबाकी से रखते हैं। वे कहते थे कि संसार बनाने वाला टेढ़ा नहीं है, इंसान टेढ़ा है, इसलिये इंसान को अपना जन्म सुधारना चाहिए, मृत्यु अपने आप सुधर जाएगी।

20 साल पहले देखे 4 सपने हुए पूरे

20 वर्ष पहले मुनि ने जो चार सपने देखे थे, वे सभी साकार हो गए हैं। इन सपनों में भगवान महावीर को मंदिरों से निकालकर चौराहे पर लाना, लाल किले से राष्ट्र को संबोधित करना, भारतीय सेना से रूबरू होना और लोकसभा व विधानसभाओं में प्रवचन देना है। इन सपनों के पूरा होते ही मुनि ने चार और नए सपने देखे, जिसमें 10 लाख लोगों को मांसाहार व शराब छुड़वाकर उन्हें शाकाहारी बनाना, मस्जिद व चर्च में प्रवचन कर एकता का संदेश देना, देश की सरहद पार नेपाल आदि देशों तक पैदल सफर करना और आरएसएस के गणवेश को चमड़े के जूते व बेल्ट से मुक्त करना है। इसमें से आरएसएस के गणवेश को जूते व बेल्ट से मुक्त कराने का सपना पूरा हो गया है।

मांसाहार के खिलाफ चलाया था बड़ा आंदोलन

हिंदी लेखन में महारत रखनेवाले तरुण सागर महराज ने एक टीवी चैनल के कार्यक्रम में शामिल होकर जैन धर्म मुनियों की दिनचर्या को श्रोताओं को बड़ी ही सहजता से समझाकर एक रिकॉर्ड बनाया था। वे अहिंसा नाम से एक पत्रिका भी निकालते हैं, जबकि देश में मांसाहार बंद किये जाने के लिए उन्होंने बड़ा आंदोलन किया था।

मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक और गुजरात सरकार की तरफ से उन्हें राजकीय सम्मान प्राप्त था। उनकी सबसे बड़ी उपयोगिता थी कि वे जो कहते हैं, उसका प्रयोग सबसे पहले खुद ही करते थे। टीवी चैनलों के माध्यम से देशभर में उनके प्रवचन सर्वाधिक देेखे जाते थे। जो लोगों के दिलों दिमाग को झकझोर देने का काम करते थे।

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