बागी नेताओं को महागठबंधन में ‘नो एंट्री’

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दिल्ली/ राजेश कुमार

भारतीय राजनीति हमेशा से चमकदार व्यक्तित्वों के इर्द-गिर्द घूमती आई है।लेकिन नेताओं का आभामंडल ही सबकुछ नहीं होता है।2004 का दौर सबको याद होगा।एक तरफ थी,अटल बिहारी वाजपेयी जैसी करिश्माई शख्सियत।उनके घोषित उत्तराधिकारी लालकृष्ण आडवाणी भी अपने समर्थकों के बीच लौह पुरूष के नाम से पुकारे जाते थे।दूसरी ओर,टूटी-फूटी हिंदी में मुश्किल से लिखा भाषण पढ़ने वाली सोनिया गांधी ताकतवर एनडीए के खिलाफ यूपीए गठबंधन खड़ा कर फीलगुड की हवा निकाल दी।सोनिया गाधी ने गठबंधन साझीदारों को जिस तरह जोड़े रखा,वह किसी चमत्कार से कम नही था।सवाल ये है की राहुल गांधी 2019 में वो दोहरा पाएंगे जो आज से 14 साल पहले उनकी मां सोनिया गांधी ने नींव रखी थी।अब मजबूत राष्ट्रीय विकल्प के रूप में खुद को पेश करने का आखिरी मौका कांग्रेस के लिए मध्य प्रदेश,छत्तीसगढ़ और राजस्थान के विधानसभा चुनाव हैं।तीनों राज्यों में बीजेपी की सरकार है और जबरदस्त एंटी-इनकंबेंसी की खबरे भी आ रही हैं।ऐसे में 2019 के लोकसभा चुनाव में मोदी को रोकने के लिए विपक्षी दलों में‘एंटी-पोचिंग एग्रीमेंट’हो रहा है। इसके तहत पार्टियों में बागी नेताओं को शामिल न करने की ‘अघोषित सहमति’बनी है।यानी इस फॉर्मूले के तहत कोई नेता अगर एक पार्टी छोड़ता है तो दूसरी पार्टी उसे अपने यहां से टिकट या फिर प्रभावी पद नहीं देगी।सबसे पहले बीएसपी और एसपी फूलपुर और गोरखपुर लोकसभा उपचुनाव में साथ आए।लोकसभा की कैराना सीट पर भी एसपी-बीएसपी और कांग्रेस ने लोकदल के प्रत्याशी का समर्थन किया।यहां जीत के बाद इन दलों के बीच एंटी-पोचिंग के लिए समझौते की नींव पड़ी। अन्य दल भी इसमें शामिल हुए।

गठबंधन की पार्टियों के बीच बागी नेताओं के लिए “नो वैकेंसी”

राहुल गांधी गुजरात और कर्नाटक के कैंपेन में वे एक मैच्योर नेता के तौर पर उभरे। लेकिन ये सही है की केंद्र में वापसी का दावा मजबूत करने के लिए कांग्रेस को जो,’टर्निंग प्वाइंट’चाहिए था,वह उसे अब तक नहीं मिला है।ऐसे में बीजेपी को रोकने के लिए आम चुनाव से पहले राहुल गांधी अब गठबंधन की पार्टियों के बागियों को मंच न देने के समझौते पर सैद्धांतिक सहमति दे दी है।एग्रीमेंट में कांग्रेस के आ जाने से यह फॉर्मूला अब राष्ट्रीय रूप ले चुका है।उत्तर भारत के 4 बड़े राज्यों के दलों में भी यह सहमति हो चुकी है।बीएसपी का कहना है कि जो भी नेता गठबंधन से नाराज होकर आएगा उसे किसी भी तरफ से स्वीकार नहीं होगी।साथ ही विपक्षी पार्टियों के बीच ये भी तय हुआ है की जो भी गठबंधन होगा वह आपसी तालमेल के साथ बनाया जाएगा। ऐसे में जाहिर-सी बात है कि राजनीतिक दल एक-दूसरे से सहमति बनाएंगे तो एक-दूसरे के विरुद्ध कोई गतिविधियां नहीं चलाएंगे।इसमें किसी प्रकार की औपचारिक सहमति और समझौते की कोई जरूरत नहीं है।

फॉर्मूले पर क्षेत्रीय दलों की भी सहमति

पीएम मोदी के विजय रथ पर लगाम लगाने के लिए सभी विपक्षी पार्टियां हर मोर्चे पर एक साथ नजर आ रही है। एसपी का तर्क है समान विचारधारा वाली पार्टियां एक मंच पर एकजुट हो गई हैं। किसी भी नेता और पदाधिकारी का दल-बदल नहीं करने का फैसला लिया है। बिहार और झारखंड में भी पार्टी क्षेत्रीय दलों के साथ यह फॉर्मूला अपनाने जा रही है।कांग्रेस ने झारखंड मुक्ति मोर्चा और झारखंड विकास मोर्चा से भी आम सहमति बना ली है। आरजेडी ने इस मुद्दें पर कहा है कि साथी दलों को यह ध्यान रखना होगा कि किसी भी पार्टी के कार्यकर्ता और नेता को तोड़ा नहीं जाए। हमारी पार्टी भी इसी फॉर्मूले पर काम कर रही है। झारखंड विकास मोर्चा के अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी ने बताया कि झारखंड में सभी क्षेत्रीय दलों के बीच समझौता हो गया है। सभी मिलकर चुनाव में अपना एक प्रत्याशी खड़ा करेंगे। गठबंधन पार्टी से छोड़कर कोई किसी पार्टी में आता-जाता है तो उसे शामिल नहीं करेंगे। यह सहमति सभी के बीच बन गई है। झारखंड मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष हेमंत सोरेन ने बताया कि लोकसभा चुनाव में हम सभी मिलकर लड़ेंगे। इस पर बातचीत लगभग तय हो गई है। गठबंधन में शामिल दल के नेता और पदाधिकारी पार्टी छोड़कर अगर जाते हैं तो उसे कोई भी अपनी पार्टी में जगह नहीं मिलेगा।

आखिर है क्या ‘एंटी पोचिंग एग्रीमेंट’

एंटी पोचिंग एग्रीमेंट से यह भी स्पष्ट हो गया है कि ये पार्टियां गठबंधन की बाधाओं और चुनौतियों को गंभीरता से ले रही हैं। एक रणनीति यह भी है कि बागी नेताओं के लिए गठबंधन के विकल्प बंद हों और दामन थामने के लिए सिर्फ भारतीय जनता पार्टी ही एकमात्र विकल्प रह जाए। इससे बीजेपी के लिए पोचिंग के अवसर तो पैदा होंगे पर साथ ही उसके अपने घर में कलह के बीज पड़ जाएंगे। इधर, बीजेपी के वे सांसद जो पिछले चुनाव के ठीक पहले एसपी, बीएसपी या फिर कांग्रेस से आए थे, वे एक बार फिर अपनी पूर्व पार्टियों से वापसी के लिए संपर्क बना रहे हैं। उन्हें उम्मीद है की चूंकि वे बीजेपी से सपा या बीएसपी में लौटेंगे तो उन पर एंटी पोचिंग एग्रीमेंट लागू नहीं होगा।

कांग्रेस के सामने चुनौती

शख्सियत, मुद्दे और लहर से अलग भारत के चुनावी नतीजे अंकगणित के आधार पर भी तय होते हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण यूपी का उपचुनाव है। एसपी और बीएसपी के हाथ मिलाते ही खेल बदल गया। 2019 से पहले दो सबसे बड़े संभावित सितारे उभर रहे हैं, वे मायावती और अखिलेश यादव है। बंगाल में ममता बनर्जी की स्थिति मजबूत है। अगर चंद्रबाबू नायडू यूपीए में शामिल होते हैं तो अपनी शर्तों पर होंगे।ऐसे में कांग्रेस की चुनौतियां दो तरह की हैं। सबसे पहले उसे अपनी जमीन मजबूत रखनी है ताकि गठबंधन के निर्विवाद अगुआ की उसकी हैसियत बनी रहे। दूसरी चुनौती 2019 के चुनाव तक विपक्षी एकता कायम रखने की है।

इन दलबदलुओं को बीजेपी और कांग्रेस में फायदा हुआ

इससे पहले केंद्र सरकार में आरजेडी से आए राम कृपाल सिंह, कांग्रेस से आए हरियाणा के नेता राव इंद्रजीत सिंह और चौधरी वीरेंद्र सिंह को मंत्री बनने का मौका मिला। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार में रीता बहुगुणा जोशी, स्वामी प्रसाद मौर्य, ब्रजेश पाठक समेत बाहरी दलों से आए छह नेताओं को मंत्रिपरिषद में जगह मिली। बीजेपी छोड़कर कांग्रेस में गए नवजोत सिंह सिद्धू को पंजाब की अमरिंदर सरकार में मंत्री पद मिला है।

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