डॉ. रामदयाल मुंडा के नक्शे कदम पर चलने से आदिवासियों का उत्थान होगा: लुईस मरांडी

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रांची। राजनेता पद्मश्री और झारखंड की संस्कृति को पूरी दुनिया में पहचान दिलाने वाले डॉ रामदयाल मुंडा की जयंती 23 अगस्त को रांची स्थित डॉ राम दयाल मुंडा जनजातीय कल्याण अनुसंधान संस्थान (टीआरआई) में मनाई जा रही है। 23 से 26 अगस्त तक चलने वाली रामदयाल मुण्डा की जयंती महोत्सव की शुरुआत समाज कल्याण विभाग की मंत्री लुईस मरांडी द्वारा गुरुवार को टीआरआई में किया गया। पद्मश्री डॉ रामदयाल मुंडा की 79वीं जयंती है। इस मौके पर समाज कल्याण मंत्री लुईस मरांडी ने कहा कि डॉ रामदयाल मुंडा एक ऐसे व्यक्तित्व थे जिनके नक्शे कदम पर चलने से आदिवासियों का उत्थान होगा| उन्होंने कहा कि उनके द्वारा किए गए शोध को आगे बढ़ाने की भी जरूरत है।

मरांडी ने कहा कि डॉ रामदयाल मुंडा एक ऐसे व्यक्तित्व थे जिन्होंने झारखंड का ही नहीं बल्कि देशभर के आदिवासियों के उत्थान के लिए कई शोध किए हैं। विदेश में पढ़ाई करने के बावजूद रांची के जनजातीय विभाग की स्थापना में इनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है। आज इन्हीं की देन है कि ये विभाग निरंतर अच्छा काम कर रहा है और यहां पर ऐसे कई विद्यार्थी हैं जो शोध के क्षेत्र में विदेशों में जाकर परचम लहरा रहे हैं।

आरडी मुंडा के नाम से पूरी दुनिया में लोकप्रिय राम दयाल मुंडा का जन्म 23 अगस्त 1939 को हुआ था। 30 सितम्बर 2011 को उनका निधन हो गया। राम दयाल मुण्डा देश एक प्रमुख बौद्धिक और सांस्कृतिक शख्सियत थे। आदिवासी अधिकारों के लिए रांची, पटना, दिल्ली से लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ (यूएनओ) जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों तक उन्होंने आवाज उठाई| दुनिया के आदिवासी समुदायों को संगठित किया और देश व अपने गृहराज्य झारखंड में जमीनी सांस्कृतिक आंदोलनों को नेतृत्व प्रदान किया।

2007 में उन्हें संगीत नाटक अकादमी का सम्मान मिला, तो 22 मार्च 2010 में राज्यसभा के सांसद बनाए गए और 2010 में ही वे पद्मश्री से सम्मानित हुए। भारत सरकार ने बहुत उपेक्षा के बाद जब उन्हें सम्मान दिया तब तक कैंसर ने उन्हें जकड़ लिया था जिससे उनके सपने अधूरे रह गए। वे रांची विश्वविद्यालय, रांची के कुलपति भी रहे। उनका निधन कैंसर से 30 सितम्बर शुक्रवार, 2011 को हुआ।

रांची से 60 किलोमीटर दूर तमाड़ के दिउड़ी गांव में 1939 में जन्मे मुंडा ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा 1947 से 1953 तक अमलेसा लूथरन मिशन स्कूल तमाड़ से प्राप्त की। माध्यमिक शिक्षा 1953 से 1957 तक खूंटी हाई स्कूल से और रांची विश्वविद्यालय, रांची से मानव विज्ञान में स्नातकोत्तर (1957-1963) किया। इसके बाद उच्चतर शिक्षा अध्ययन एवं शोध के लिए वे शिकागो विश्वविद्यालय, अमेरिका चले गए जहां से उन्होंने भाषा विज्ञान में पीएचडी (1963-1968) की। फिर वहीं से उन्होंने दक्षिण एशियाई भाषा एवं संस्कृति विभाग में शोध और अध्ययन (1968-1971) किया। शोध-अध्ययन के बाद अमेरिका के ही मिनिसोटा विश्वविद्यालय के साउथ एशियाई अध्ययन विभाग में 1981 तक एसोसिएट प्रोफेसर के रूप में अध्यापन कार्य किया। डॉ मुंडा को अमेरिकन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडियन स्टडीज, भारत स्थित यूएसए एजुकेशन फाउंडेशन और जापान फाउंडेशन की तरफ से फेलोशिप भी प्राप्त हुई थी।

डॉ रामदयाल मुंडा न सिर्फ एक अंतरराष्ट्रीय स्तर के भाषाविद्, समाजशास्त्री और आदिवासी बुद्धिजीवी और साहित्यकार थे, बल्कि वे एक अप्रतिम आदिवासी कलाकार भी थे। उन्होंने मुंडारी, नागपुरी, पंचपरगनिया, हिंदी, अंग्रेजी में गीत-कविताओं के अलावा गद्य साहित्य रचा है। उनकी संगीत रचनाएं बहुत लोकप्रिय हुई हैं और झारखंड की आदिवासी लोक कला, विशेषकर ‘पाइका नाच’ को वैश्विक पहचान दिलाई है। वे भारत के दलित-आदिवासी और दबे-कुचले समाज के स्वाभिमान थे और विश्व आदिवासी दिवस मनाने की परंपरा शुरू करने में उनका अहम योगदान रहा है।

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