अध्यात्म का पर्याय है संस्कृति- पण्ड्या

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ANJALI SINGH
नई दिल्ली। गायत्री परिवार प्रमुख डॉ. प्रणव पाण्ड्या ने कहा कि अध्यात्म का पर्याय है संस्कृति। अध्यात्म मनुष्य के अंदर नवोन्मेष, जागृति पैदा करती है। अध्यात्म मनुष्य के जीवन में श्रेष्ठताओं, सत्प्रवृत्तियों, श्रेष्ठ गुणों को उतारने की कला का नाम है।
वे शांतिकुंज के मुख्य सभागार में आयोजित शिक्षक गरिमा शिविर को संबोधित कर रहे थे। शिविर में गुजरात व दक्षिण भारत से आये सैकड़ों शिक्षक, शिक्षिकाएँ एवं भारतीय संस्कृति को जन-जन तक पहुंचाने में जुटे सृजन शिल्पी युवा सम्मिलित हैं।
डॉ. पण्ड्या ने कहा कि संस्कृति वह है, जो हमारे संस्कारों को पल्लवित करती है, बढ़ाती है और संस्कारवान बनाती सिखाती है। संस्कृति मनुष्य को मानसिक शांति व सुख प्रदान करती है। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति के द्वारा श्रेष्ठतम संस्कारों का निर्माण करना है। भारतीय संस्कृति ही विश्व का नवनिर्माण कर सकती है। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा के माध्यम से बाल्यकाल से ही संस्कृति बीजारोपण करना श्रेष्ठतम कार्य है। इसके माध्यम से ही विद्यार्थियों के जीवन को सही अर्थों में गढ़ा जा सकता है। उनके अंतर जगत में सकारात्मक परिवर्तन लाने से ही वे ऊँचे आदर्शों को अंगीकार कर सकेंगे। महात्मा गांधी, पं. श्रीराम शर्मा आचार्य आदि महापुरुषों ने अपने जीवन में सकारात्मक परिवर्तन कर ही समाज को नई दिशा देने में कामयाब हो पाये थे। अपने कई दशकों के अनुभवों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि परिवार और समाज को सभ्य व सुसंस्कृत बनाना हो तो संस्कार के साथ स्वच्छता का भी ध्यान रखना होगा। स्वच्छता से ही तन, मन पवित्र रहता है। इस दिशा में स्वयं से शुरुआत करने के साथ अपने निकटवर्ती सहपाठियों, विद्यार्थियों को प्रेरित करना चाहिए।
दूसरे सत्र को संबोधित करते हुए देव संसकृत विश्वविद्यालय के प्रतिकुलपति डॉ. चिन्मय पाण्ड्या ने कहा कि आज जिस तरह की विपदाएं हैं, उनसे निजात पाने के लिए प्राकृतिक रूप से समाधान खोजने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि ऊंचे आदर्शों व महान कार्यों के लिए समर्पण भाव आवश्यक है। व्यवस्थापक शिवप्रसाद मिश्र ने कहा कि भारतीय संस्कृति विश्व की महान संस्कृति है। इससे ही विश्व का कल्याण संभव है। भारतीय संसकृत ज्ञानपीठ के समन्वयक प्रदीप दीक्षित ने बताया कि दो दिन तक चले इस शिविर में गुजरात प्रांत के सैकड़ों शिक्षक, शिक्षिकाएँ एवं भारतीय संस्कृति को जन-जन तक फैलाने में जुटे युवा शामिल हैं, तो वहीं दक्षिण भारत के राज्यों में भारतीय संस्कृति के विस्तार में जुटे सृजनशिल्पी साधक प्रतिभागी बनें। उन्होंने बताया कि नौ सत्रों में प्रतिभागियों को सहकार, सहयोग के साथ सफलता के विविध पहलुओं पर विस्तार से जानकारी दी गयी। प्रतिभागियों का कालीचरण शर्मा, देवसंसकृत विश्वविद्यालय के कुलसचिव संदीप कुमार, जेपी वर्मा, दिनेश पटेल आदि विषय विशेषज्ञों ने विभिन्न विषयों पर मार्गदर्शन किया।

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